दिनेश शर्मा को अंडमान भेजकर BJP ने क्या साधा? सक्रिय राजनीति से ‘सम्मानजनक विदाई’ के साथ ब्राह्मण वोट बैंक को बड़ा संदेश, लखनऊ से दिल्ली तक सियासी मायने

लखनऊ: उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ भाजपा नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री डॉ. दिनेश शर्मा को अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह का उपराज्यपाल नियुक्त किया गया है। उनकी नियुक्ति को सिर्फ एक संवैधानिक पद पर नई जिम्मेदारी के तौर पर नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसके सियासी मायने भी निकाले जा रहे हैं। खासकर उत्तर प्रदेश की ब्राह्मण राजनीति के संदर्भ में इसे भाजपा के लिए एक अहम संदेश माना जा रहा है। वहीं, सक्रिय राजनीति में लंबे समय तक अहम भूमिका निभाने वाले दिनेश शर्मा के लिए यह नियुक्ति सम्मानजनक विदाई के तौर पर भी देखी जा रही है।

दिनेश शर्मा का राजनीतिक सफर लखनऊ से शुरू होकर उत्तर प्रदेश सरकार, राज्यसभा और अब उपराज्यपाल पद तक पहुंचा है। राज्यसभा का उनका कार्यकाल इसी साल नवंबर में खत्म होने वाला था। ऐसे में उससे पहले उन्हें संवैधानिक पद की जिम्मेदारी दिया जाना भाजपा के भीतर भी एक महत्वपूर्ण राजनीतिक बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है।

उपराज्यपाल बनाकर दिनेश शर्मा को ‘सम्मानजनक विदाई’

दिनेश शर्मा संगठन और सरकार, दोनों में लंबे समय तक सक्रिय रहे हैं। वह दो बार लखनऊ के मेयर रहे। 2017 में भाजपा की सरकार बनने के बाद उन्हें उत्तर प्रदेश का उपमुख्यमंत्री बनाया गया। इसके बाद वह राज्यसभा पहुंचे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पृष्ठभूमि से आने वाले दिनेश शर्मा लखनऊ विश्वविद्यालय में प्रोफेसर भी रहे हैं।

भाजपा में उनकी छवि एक सौम्य, निष्ठावान और विवादों से दूर रहने वाले नेता की रही है। अब उन्हें अंडमान एवं निकोबार का उपराज्यपाल बनाकर सक्रिय राजनीति से एक सम्मानजनक विदाई दी गई है।

क्या BJP ने एक फैसले से दो सियासी निशाने साधे?

दिनेश शर्मा को उपराज्यपाल बनाए जाने का एक अहम पहलू उनकी राज्यसभा सीट से भी जुड़ा है। उनका कार्यकाल नवंबर में समाप्त होना है। राजनीतिक हलकों में चर्चा रही है कि अगर उन्हें दोबारा राज्यसभा भेजा जाता तो केंद्र में मंत्री पद के संभावित दावेदारों में उनका नाम आ सकता था।

अब उन्हें उपराज्यपाल बनाए जाने से उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के लिए किसी दूसरे ब्राह्मण चेहरे को आगे बढ़ाने की गुंजाइश बनती है। साथ ही, केंद्र की मंत्रिपरिषद में भी उत्तर प्रदेश से किसी नए ब्राह्मण चेहरे को जगह दिए जाने की संभावनाओं की चर्चा है।

ब्राह्मणों की नाराजगी के बीच BJP का बड़ा संदेश

दिनेश शर्मा की नियुक्ति का सबसे अहम सियासी संदर्भ उत्तर प्रदेश के ब्राह्मण मतदाताओं से जुड़ा माना जा रहा है। ब्राह्मण समुदाय लंबे समय से भाजपा के पारंपरिक समर्थक वर्गों में रहा है, लेकिन पिछले कुछ समय से सरकार और संगठन में प्रतिनिधित्व को लेकर इस वर्ग की नाराजगी की चर्चा भी होती रही है।

यूजीसी की गाइडलाइन्स समेत कुछ मुद्दों को लेकर ब्राह्मण समुदाय के बीच असंतोष की आवाजें सामने आई हैं। ऐसे समय में भाजपा के एक वरिष्ठ ब्राह्मण चेहरे को केंद्र शासित प्रदेश का उपराज्यपाल बनाना पार्टी की ओर से सम्मान और प्रतिनिधित्व का संदेश देने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

ब्रजेश पाठक संभाल रहे हैं ब्राह्मणों से संवाद की कमान

उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण समुदाय के साथ संवाद की जिम्मेदारी फिलहाल उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक के पास है। हाल ही में आरक्षण को लेकर आंदोलन कर रहे लोगों से उन्होंने लखनऊ में मुलाकात की थी। इस दौरान उन्होंने भरोसा दिया था कि जल्द ही उनकी मुलाकात किसी बड़े केंद्रीय मंत्री से कराई जाएगी।

इसके बाद केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने दिल्ली में इन आंदोलनकारियों से मुलाकात की। भाजपा की ओर से यूजीसी गाइडलाइन्स पर दोबारा विचार करने का भरोसा भी दिया गया है। पार्टी की ओर से सुप्रीम कोर्ट में भी इसी तरह की बात कही गई है।

हरीश द्विवेदी और शिवानंद द्विवेदी को भी मिली अहम जिम्मेदारी

ब्राह्मण प्रतिनिधित्व को लेकर भाजपा की हालिया गतिविधियों में संगठनात्मक नियुक्तियों का भी जिक्र हो रहा है। भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन की टीम में पूर्वी उत्तर प्रदेश से हरीश द्विवेदी को राष्ट्रीय महामंत्री बनाया गया है। वहीं शिवानंद द्विवेदी को सोशल मीडिया टीम का सह संयोजक बनाया गया है।

इसी के साथ केंद्र की संभावित मंत्रिपरिषद में फेरबदल को लेकर भी उत्तर प्रदेश से किसी ब्राह्मण नेता को कैबिनेट में जगह मिलने की चर्चा है। फिलहाल जितिन प्रसाद केंद्र में राज्य मंत्री हैं, जबकि मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में महेंद्र नाथ पांडेय को कैबिनेट मंत्री बनाया गया था।

फिर राजनाथ सिंह का नाम क्यों चर्चा में आया?

दिनेश शर्मा की नियुक्ति के बाद उनके आभार संदेश ने लखनऊ के राजनीतिक गलियारों में अलग चर्चा छेड़ दी। उन्होंने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, केंद्रीय गृह मंत्री और भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के प्रति आभार जताया, लेकिन लखनऊ के सांसद और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का व्यक्तिगत तौर पर नाम नहीं लिया।

यह बात इसलिए चर्चा में आई क्योंकि दिनेश शर्मा का राजनीतिक सफर लखनऊ से गहराई से जुड़ा रहा है। वह दो बार लखनऊ के मेयर रहे और इसी शहर से उनकी राजनीतिक पहचान मजबूत हुई। राजनाथ सिंह भी लंबे समय से लखनऊ का प्रतिनिधित्व करते रहे हैं।

नाम नहीं लिया तो क्या कोई सियासी संदेश है?

हालांकि सिर्फ आभार संदेश में किसी नेता का नाम नहीं होने से राजनीतिक मतभेद या दूरी का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। दिनेश शर्मा ने अपने संदेश में कई नेताओं के व्यक्तिगत नाम लेने के बजाय राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और केंद्रीय नेतृत्व के प्रति सामूहिक रूप से आभार जताया था।

इसलिए राजनाथ सिंह का नाम जानबूझकर नहीं लिया गया या यह महज संयोग था, इस पर अभी कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण नहीं है। फिलहाल यह सिर्फ राजनीतिक चर्चा का विषय है।

लखनऊ का सियासी समीकरण भी क्यों अहम है?

दिनेश शर्मा की नियुक्ति को लखनऊ की राजनीति से जोड़कर भी देखा जा रहा है। राजनीतिक हलकों में उनके भविष्य में लखनऊ लोकसभा सीट से संभावित दावेदारी और केंद्र में मंत्री बनाए जाने को लेकर चर्चाएं रही थीं। अब उपराज्यपाल बनने के बाद इन संभावनाओं पर फिलहाल विराम लगता दिख रहा है।

कुछ राजनीतिक जानकार इसे लखनऊ में राजनाथ सिंह की भूमिका के संदर्भ में भी देखते हैं। हालांकि यह राजनीतिक विश्लेषण और अटकल का विषय है। कोई आधिकारिक तौर पर यह नहीं कहता कि दिनेश शर्मा की नियुक्ति के पीछे लखनऊ का यही समीकरण था।

कलराज मिश्र से भी रहा है पुराना राजनीतिक जुड़ाव

दिनेश शर्मा का भाजपा के वरिष्ठ नेता और राजस्थान के राज्यपाल कलराज मिश्र से भी पुराना राजनीतिक संबंध रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, जब कलराज मिश्र उत्तर प्रदेश सरकार में लोक निर्माण और पर्यटन मंत्री थे, उस दौर में लखनऊ विश्वविद्यालय में कॉमर्स के लेक्चरर रहे दिनेश शर्मा को उत्तर प्रदेश पर्यटन निगम का उपाध्यक्ष और राज्यमंत्री स्तर का दर्जा दिए जाने की चर्चा रही थी।

इसके बाद दिनेश शर्मा का राजनीतिक कद लगातार बढ़ता गया। वह लखनऊ के मेयर बने, उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री रहे, राज्यसभा पहुंचे और अब अंडमान एवं निकोबार के उपराज्यपाल नियुक्त किए गए हैं।

मेयर से डिप्टी सीएम, राज्यसभा और अब एलजी तक का सफर

दिनेश शर्मा ने लखनऊ के मेयर के तौर पर अपनी पहचान बनाई। इसके बाद भाजपा संगठन में उनकी भूमिका बढ़ी और 2017 में योगी आदित्यनाथ सरकार के पहले कार्यकाल में उन्हें उपमुख्यमंत्री बनाया गया।

2022 में योगी सरकार के दूसरे कार्यकाल में वह उपमुख्यमंत्री नहीं बने। इसके बाद 2023 में वह उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के लिए निर्विरोध चुने गए। अब केंद्र सरकार ने उन्हें अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह का लेफ्टिनेंट गवर्नर नियुक्त किया है।

क्या BJP ब्राह्मण वोट बैंक को फिर मजबूती से साधना चाहती है?

उत्तर प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मण समुदाय को लंबे समय से महत्वपूर्ण राजनीतिक वर्ग माना जाता है। भाजपा के भीतर भी इस समुदाय के समर्थन को लेकर लगातार रणनीति बनती रही है। दिनेश शर्मा की नियुक्ति ऐसे समय हुई है जब ब्राह्मण प्रतिनिधित्व और सम्मान को लेकर राजनीतिक बहस जारी है।

भाजपा को उम्मीद है कि उचित प्रतिनिधित्व और सम्मान के जरिए इस समुदाय की नाराजगी दूर की जा सकती है। पार्टी के कई नेता यह भी मानते हैं कि ब्राह्मण समुदाय के लिए भाजपा अब भी प्रमुख राजनीतिक विकल्प है। ऐसे में दिनेश शर्मा जैसे वरिष्ठ ब्राह्मण नेता को संवैधानिक पद देना पार्टी की इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

 

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